आशाओं तुम पीड़ा के घर होती जाना
वहाँ सीढियाँ चढ़ता तुमको दर्द मिलेगा
पथराई आँखों का काजल जस का तस है
रसवंती होठों का अमृत भी नीरस है
भाव अभावों की कोठी में बंद पड़े हैं
दर्द डूबती आशाओं की हर इक नस है
अरी हवाओं पतझड़ के घर होती जाना
हरियाली से लड़ता तुमको दर्द मिलेगा
सपनों के जमघट में खोया जीवन सारा
विष के कूपे में बंदी है अमृत धारा
आशा की किरणों के आगे बादल काले
जैसे टूटा हो बस्ती में पुच्छल तारा
अरी लताओं काँटों के घर होती जाना
नई कहानी गढ़ता तुमको दर्द मिलेगा
लेकिन मेरा धैर्य डिगना नामुमकिन है
रात अंधेरी कितनी भी हो, होता दिन है
सुनलो बहती रेगिस्तानी गर्म हवाओं
अगर इरादा हो तो होता सब मुमकिन है
सुनो दर्द को गढ़ने वाले सारे कारण
अब रामायण पढ़ता तुमको दर्द मिलेगा
-नरेंद्र दाधीच
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