मुझे सपने नहीं आते
क्योंकि मैं उथला हूँ
पर मेरी नीन्द गहरी है
मैं बुझकर नहीं
थककर सोता हूँ
पता नहीं
सपनों का दम कैसे घुटता है
अरमानों का जनाज़ा कैसे उठता है
यार! प्यार मैंने भी किया है
पर मेहनत से, मशक्कत से
ये देखो रे,
मेरी हथेलियों में
छालों के औघड़
भभूत रमाये बैठे हैं
जो सख़्त इतने हैं
कि आनेवाली पीढ़ी के स्वप्नमहल का
इन पर शिलान्यास करवा लो
और चान्द पर धक्का खाने वाले राॅकेट
इन पर आसानी से उतरवा लो
भौतिकता से परेशान भूतो!
मुझसे ईष्र्या करो
मुझे सपने नहीं आते हैं
क्योंकि वो सब
तुम पर मँडराते हैं।
मैं रोता नहीं हूँ
क्योंकि मैं किसी ऐसे-वैसे का होता नहीं हूँ
उगता वही है, जो बोया जाता है
और बन्दा ख़ूब जानता है कि क्यों रोया जाता है
हाँ कुछ खारा गर्म पानी
मेरी पलकों से पिघलकर मेरे गालों तक आता है
मेरा गला तक भीग जाता है
पर न वो आँसू है,
न वो रोना है
वह तो थके दीप्त जीवन का पसीना है
जो नहीं बहे
तो मैं मर जाऊँ
ये कहने
अब मैं किस किसके घर जाऊँ!
तुम चाहो
तो सबसे कह देना
कि मैं रोता नहीं हूँ
क्योंकि मैं किसी ऐसे-वैसे का होता नहीं हूँ
मैं मरूंगा नहीं
क्योंकि मैं कोई ऐसा काम करूंगा नहीं
मरे वो
जो ज़िन्दगी से थके, बुझे, टूटे, हारे
या जो पराये दर्द का पन्थ नहीं बुहारे
मै ताज़ा, प्रदीप, अटूट और अजीत हूँ
बेशक़ देख लो, भुगत लो मुझे
मेरी ताज़गीे, मेरी दीप्ति और मेरी हिम्मत को
यार, तुम अवाक् रह जाओगे
कि मैं असाधारण रूप से साधारण हूँ
और अपने आप का अकेला उदाहरण हूँ
अपने साधारणत्व में
कुछ फेर या फार मुझे करना नहीं है
क्योंकि मुझे मरना नहीं है
मेरे अमरत्व पर मुझे यकीन है
और तुम भी यकीन करो कि मैं मरूंगा नहीं
क्योंकि मैं कोई ऐसा काम करूंगा नहीं
-बालकवि बैरागी
No comments:
Post a Comment