Saturday

अगर तीसरा युद्ध हुआ

मैं सोच रहा हूँ अगर तीसरा युद्ध हुआ
इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा
मैं सोच रहा हूँ अगर ज़मीं पर उगा ख़ून
इस रंग महल की चहल-पहल का क्या होगा

ये हंँसते हुए गुलाब महकते हुए चमन
जादू बिखराती हुईं रूप की ये कलियाँ
ये मस्त झूमती हुई बालियाँ धानों की
ये शोख़ सजल शरमाती गेहूँ की गलियाँ
गदराते हुए अनारों की ये मंद हँसी
ये पेंगें बढ़ा-बढ़ा अमियों का इठलाना
ये नदियों का लहरों के बाल खोल चलना
ये पानी के सितार पर झरनों का गाना
मैनाओं की नटखटी, ढिठाई तोतों की
ये शोर मोर का, भोर भृंग की ये गुनगुन
बिजली की खड़क-धड़क बदली की चटक-मटक
ये जोत जुगनुओं की झींगुर की ये झुनझुन
किलकारी भरते हुये दूध से ये बच्चे
निर्भीक उछलती हुई जवानों की टोली
रति को शरमाती हुई चांद-सी ये शक्लें
संगीत चुराती हुई पायलों की बोली
आल्हा की ये ललकार, थाप ये ढोलक की
सूरा-मीरा की सीख, कबीरा की बानी
पनघट पर चपल गगरियों की ये छेड़छाड़
राधा की कान्हा से गुपचुप आनाकानी

क्या इन सब पर ख़ामोशी मौत बिछा देगी
क्या धुंध धुआँ बनकर सब जग रह जायेगा
क्या कूकेगी कोयलिया कभी न बगिया में
क्या पपिहा फिर न पिया को पास बुलायेगा

जो अभी-अभी सिंदूर दिये घर आई है
जिसके हाथों की मेंहदी अब तक गीली है
घूँघट के बाहर आ न सकी है अभी लाज
हल्दी से जिसकी चूनर अब तक पीली है
क्या वो अपनी लाड़ली बहन; साड़ी उतार
जा कर बेचेगी नित चूड़ियाँ बाज़ारों में
जिसकी छाती से फूटा है मातृत्व अभी
क्या वो माँ दफ़नायेगी दूध मज़ारों में
क्या गोली की बौछार मिलेगी सावन को
क्या डालेगा विनाश झूला अमराई में
क्या उपवन की डालों में फूलेंगे अँगार
क्या घृणा बजेगी भौंरों की शहनाई में

चाणक्य, मार्क्स, एंजिल, लेनिन, गांधी, सुभाष
सदियाँ जिनकी आवाज़ों को दुहराती हैं
तुलसी, वर्जिल, होमर, गोर्की, शाह, मिल्टन
चट्टानें जिनके गीत अभी तक गाती हैं
मैं सोच रहा क्या उनकी क़लम न जागेगी
जब झोपड़ियों में आग लगायी जायेगी
करवटें न बदलेंगीं क्या उनकी क़ब्रें जब
उनकी बेटी भूखी पथ पर सो जायेगी
जब घायल सीना लिये एशिया तड़पेगा
तब वाल्मीकि का धैर्य न कैसे डोलेगा
भूखी क़ुरआन की आयत जब दम तोड़ेगी
तब क्या न ख़ून फिरदौसी का कुछ बोलेगा

ऐसे ही घट छलके, ऐसी ही रस ढुलके
ऐसे ही तन डोले, ऐसे ही मन डोले
ऐसी ही चितवन हो, ऐसी ही चितचोरी
ऐसे ही भँवरा भ्रमे, कली घूँघट खोले
ऐसे ही ढोलक बजें, मँझीरे झंकारें
ऐसे ही हँसे झुँझुने, बाजें पैंजनियाँ
ऐसे ही झुमके झूमें, चूमें गाल-बाल
ऐसे ही हों सोहरें, लोरियाँ-रसबतियाँ
ऐसे ही बदली छाये कजली अकुलाये
ऐसे ही बिरहा बोल सुनाये साँवरिया
ऐसे ही होली जले, दीवाली मुसकाये
ऐसे ही खिले-फले-हरयाये हर बगिया
ऐसे ही चूल्हे जलें, राख कि रहें गरम
ऐसे ही भोग लगाते रहें महावीरा
ऐसे ही उबले दाल, बठोही उफनाये
ऐसे ही चक्की पर गाये घर की मीरा

बढ़ चुका बहुत अब आगे रथ निर्माणों का
बम्बों के दल-बल से अवरुद्ध नहीं होगा
है शान्त शहीदों का पड़ाव हर मंज़िल पर
अब युद्ध नहीं होगा, अब युद्ध नहीं होगा

~गोपालदास 'नीरज'

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