जब नम्र निवेदन निष्फल हो, हठ योग की ठाना करते हैं
ऐ पर्दानशीं, तेरा पर्दा मस्ताने न माना करते हैं
हम जानते बिकते तंगदिली उपदेशक तेरे दुकानों में
पर प्यास हमारी व्यापक है, पैमाने न माना करते हैं
मन्दिर में मिले, मस्जिद में मिले, गिरजे में मिले, गुरुद्वारे में
पीने से कहीं पर भी जाकर, मयख़ाने न माना करते हैं
हमने उसको पहले तो अनन्त, अबाध, अनादि, अनूप कहा
फिर क़ैद किया दीवारों में, दीवाने न माना करते हैं
जिसका जलवा हर ज़र्रे में उस यार से यारी जोड़ी तो
जब राम, सियामय हो जाता, बुतख़ाने न माना करते हैं
अपने एहसास की आँखों से जो रूप ‘मयूख’ ने देखा है
उस ज्योति को जल जाने वाले परवाने ही जाना करते हैं
-बशीर अहमद मयूख
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